आजादी के 74 साल बाद भी, सीवर कर्मी आज भी गुलाम है और जातिवाद की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है

नई दिल्ली (समाज वीकली)- 27 नवंबर, 2021, शनिवार, दोपहर 2:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक “सीवर वर्कर्स के साथ राउंडटेबल” का आयोजन किया गया, जिसमें दिल्ली के सीवर कर्मचारी संगठन और सरकारी विभागों के जिम्मेदार लोग एक साथ आए | कार्यशाला में 100 से अधिक सीवर कर्मचारियों ने भाग लिया।
दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच (DASAM) ने ने इस कार्यक्र्म का आयोजन किया जो दिल्ली में सीवर श्रमिकों की सामाजिक, आर्थिक और कामकाजी स्थिति पर काम करता है; विशेष तौर पर ठेकेदारी के तहत काम करने वाले सफाई कर्मियों के लिए |
श्री अशोक कुमार (राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर DASAM) ने शोषण कारी ठेकेदारी व्यवस्था के बारे में बताया और सफाई कर्मचारियों की तरफ से दिल्ली के विधायकों के सामने अनुबंधित सीवर श्रमिकों के मुद्दों को रखने और उसे सदन में उठाने के आशवासन पर लोगों को बताया | उन्होंने ठेके पर काम करने वाले सीवर श्रमिकों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर किये गए सर्वे में आए मुद्दों जैसे वर्क परमिट, आईडी कार्ड, स्वास्थ्य, मजदूरी, दुर्घटना, मुवावजा, आदि मामलों के बारे में बताया और बर्बर स्थति से अवगत कराया |
इसे जोड़ते हुए, सुश्री एना ज़फ़र (राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर, DASAM) ने DASAM के बारे में विस्तार से बताया और पाने अनुभव को साझा किया कि कैसे अस्पृश्यता अवैध होने के बावजूद भी सीवर श्रमिकों को अस्पृश्यता का सामना करना पड़ता है | यहां तक कि जब कार्यकर्ता किसी घर से पानी मांगता है, तो उसे सीधे मना कर दिया जाता है या ‘बोतल अपने साथ ले जाने’ के लिए कहा जाता है।
खुली चर्चा में सफाई कर्मियों ने अपने बाते कहीं | ये सफाई कर्मी अपनी आजीविका खोने के डर अपने नाम को गोपनीय रखना चाहते हैं; उन्हें डर है कि यदि पता चला जायेगा तो ठेकेदार या सरकार उसकी आजीविका छीन लेगें | उनके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
• हम सीवर में 10 साल से अधिक समय से काम कर रहे हैं इस उम्मीद में कि शायद किसी दिन हमें एक स्थायी नौकरी मिल जाएगी |
• हमें सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी मिलती है और किसी तरह की कोई सुविधा नहीं मिलती जैसे स्वास्थ्य, बीमा, PF, ESI, आदि |
• ठेकेदार छह महीने का ठेका मिलने के बावजूद हर छह महीने में केवल 4 महीने के लिए श्रमिकों को काम पर रखता है | हमें इस काम को भी बचाए रखने के लिए अजीबोगरीब काम करने पड़ते हैं |
• एक अनुबंध समाप्त होने के बाद, हमें चिंता करनी होती है कि हमें फिर से काम पर रखा जाएगा या नहीं |
• नौकरी जाने का खतरा इस तरह से होता कि हम ठेकेदार या किसी अन्य के शोषण के खिलाफ कुछ कह भी नहीं सकते और न ही अपनी आवाज उठा सकते हैं |
• सीवर खोलते समय चोट लगना इतना आम है कि हम इसे चोट के रूप में भी नहीं गिनते हैं और ऐसी चोटों के इलाज का खर्च हमें खुद उठाना पड़ता है |
 • इसके अलावा, जब अधिकारियों की ओर से हमें हमारी वर्दी प्रदान करने में देरी होती है, तो हमें वर्दी में नहीं होने की कीमत चुकानी पड़ती है और हमारा वेतन दंड के रूप में काट लिया जाता है |
• आजादी के 74 साल बाद भी, सीवर कर्मी आज भी गुलाम है और जातिवाद की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है।
सीवर कर्मियों की बात सुनने के बाद निम्नलिखित पैनलिस्टों ने उपस्थित लोगों के साथ अपने सुझाव साझा किए:
 • श्री संजय गहलोत (चेयरमैन, दिल्ली सफाई कर्मचारी आयोग)
• श्री वीरेंद्र गौड़ (अध्यक्ष, नगर कर्मचारी लाल झंडा यूनियन। सीटू)
• श्री वेद प्रकाश बिड़ला (अध्यक्ष, दिल्ली जल बोर्ड सीवर विभाग मजदूर संगठन)
• श्री बीरपाल परचा (सदस्य, दिल्ली जल बोर्ड सीवर विभाग मजदूर संगठन)
• श्री कृष्ण गोपाल (सचिव दिल्ली नगर पालिका कर्मचारी लाल झंडा संघ)
• सुश्री शशि राज (उप संयोजक, दिल्ली जनतांत्रिक गठबंधन)
श्री वीरेंद्र ने न्यूनतम वेतन के लिए स्वीकृति प्राप्त करने के दौरान श्रमिकों और यूनियनों के संघर्षों के बारे में बताया | न्यूनतम मजदूरी का लाभ जो पहले घोषित किया गया था, वह भी श्रमिकों तक नहीं पहुंचा रहा है | सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी के अन्य निर्देश जारी किए गए हैं | श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी से कम पैसे मिलते रहते हैं क्योंकि जो भी राशि जोड़ी जाती है, वह ठेकेदारों द्वारा ले ली जाती है | उन्होंने पूछा, ‘सीवर का काम, जो दैनिक काम की श्रेणी में आता है, आउटसोर्स क्यों किया जाता है?’ उन्होंने अनुचित लेबर लॉ और नियमों के बारे में भी बात की जो कार्यकर्ता को किसी भी संघ में शामिल होने से वंचित करता है जिससे कभी न खत्म होने वाले शोषण के रास्ते खुलते हैं |
सुश्री शशि ने कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की मामूली भागीदारी के बावजूद, अधिकांश कार्यकर्ता दलित समुदाय से हैं, जो ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित रहा है और अभी भी उत्पीड़ित है | कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालने के लिए एक बुनियादी सुविधा के लिए रो रहे हैं जो अधिकारियों को सुनाई नहीं दे रहा है | ऐसा इसलिए है कि सभी जानते हैं कि सीवर में कौन काम कर रहा है !
सबकी बात सुनने के बाद, श्री संजय गहलोत ने अपनी यात्रा साझा की कि कैसे उन्होंने एक सफाई कर्मचारी के रूप में काम करना शुरू किया, कभी भी अपनी शिक्षा की उपेक्षा नहीं की और अब दिल्ली सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष हैं | वह समुदाय के उत्थान के लिए काम करने के लिए हमेशा तैयार हैं क्योंकि वह इसमें कार्यरत लोगों के संघर्ष और दर्द को समझते हैं | उन्होंने श्रमिकों की एकता पर जोर दिया और सुझाव दिया कि पूरे भारत के श्रमिकों को एकजुट होकर अपनी मांगों को मजबूती प्रदान करनी चाहिए | उन्होंने कहा कि ‘संविदात्मक प्रणाली’ शब्द सुनते ही उनका खून खौल उठता है क्योंकि उन्हें पता है कि यह श्रमिकों के लिए कितना शोषणकारी है | वह व्यवस्था को चुनौती देने के लिए तैयार हैं और ठेका प्रणाली में कार्यरत सभी कर्मचारियों को स्थायी करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं | उन्होंने भारतीय संविधान की प्रस्तावना को पढ़कर समाप्त किया और कहा कि यह उन सभी अधिकारों की गारंटी देता है जिनके लिए हम संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है, हम सही रास्ते पर हैं | हमें किसी चीज या किसी से नहीं डरना चाहिए |