दलित कागज़ कहाँ से लायेंगे ?

विरोध नागरिकता दिये जाने से नहीं, बल्कि छीने जाने की नीयत और उसके भेदभाव पूर्ण होने के खिलाफ !

CAANRC ब्राह्मणवाद की जड़ों को मजबुत करके मनुवादी व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने की साजिश है!

 

एक अनुमान के अनुसार :

  • ·         6.2 करोड़ दलित आजीविका की तलाश में अन्य जिलों या राज्यों में पलायन करते हैं.
  • ·         87.7% दलित अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं.
  • ·         शहरी क्षेत्रों में रहनेवाले लगभग 1.75 आश्रयहीन लोगों में 36 % दलित वर्ग से हैं.
  • ·         लगभग 81% दलित आबादी भूमिहीन है.
  • ·         शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी दलित समुदाय राष्ट्रीय औसत से बहुत ही है.

·         लगभग 95% सफाईकर्मी समुदाय (बाल्मीकिके लोग अपने मूल स्थान से आजीविका के लिये लम्बे समय पहले ही शहरों में पलायन कर चुके हैं.   इन में से लगभग 75% लोगों का अपने मूल स्थान से किसी भी प्रकार का रिश्ता नहीं रह गया है.

यदि उक्त आंकड़ों की कसौटी पर केंद्र सरकार द्वारा पारित नागरिक संशोधन कानून (सीएए)  का अध्ययन किया जाये तो दलित वर्ग का यह सबसे बड़ा हिस्सा इस कानून के तहत अपनी नागरिकता को साबित करने में पूर्ण रूप से असफल रह सकता हैl 

इन तथ्यों के प्रति सरकार की अनदेखी दलितों के प्रति एक बड़ी साजिश का अहसास कराती है 

सरकार द्वारा यह स्पष्ट किया जा चूका है कि राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर (NPRके तहत लोगों से सिर्फ जानकारी ही ली जाएगी और किसी भी प्रकार का साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होगी. सरकार की तरफ से यह भी बहुत ही स्पष्टरूप से कहा जा चूका है कि एनपीआर के बाद NRC की प्रक्रिया को शुरू किया जायेगा जिसका अभी कोई भी प्रारूप सरकार ने तैयार नहीं किया है. देश के गृह मंत्री यह स्पष्ट कर चुके हैं कि NRC की प्रक्रिया के दौरान देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने मूल निवास एवं अपने  अपने माता – पिता (दोनों या किसी एकके जन्म का साक्ष्य देना होगा. 

विचारणीय यह भी है कि एनपीआर में जो सूचनायें अभी दर्ज कराई जाएँगी यदि एनआरसी में  उन्हीं सूचनाओं के सत्यापन के लिये साक्ष्य प्रस्तुत करने की शर्त लगा दी जाएगी तो  उस स्थिति में क्या होगा ? 

गत 21जनवरी को बैंगलूरू  (कर्नाटक) में एक 300 परिवारों की दलित-मुस्लिम बस्ती को “बंग्लादेशी कालोनी” बताकर बिना किसी क़ानूनी प्रक्रिया या सूचना के उजाड़ दिया गया. देश भर के सभी शहरों के प्रमुख इलाकों में स्लम या मलिन बस्तियों में सबसे ज्यादा दलित और मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं. इनकी नागरिकता पर संशय पैदा करके दलित बस्ती की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की भू माफियाओं की साजिशें शुरू हो चुकी हैं. इस एक उदाहरण से हम आने वाले खतरे का आंकलन कर सकते हैं. 

प्रत्यक्ष रूप में यह भले ही सिर्फ मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव करती हैलेकिन इस कानून के जरिये सरकार RSS के लम्बे समय से मनुस्मृति   के आधार पर “हिन्दू राष्ट्र“ को पूरा करने की मंशा भी पूरी करती नज़र  रही हैl 

मनुस्मृति के आधार पर भारत को “हिन्दू राष्ट्र” घोषित करने के पीछे सिर्फ हिन्दू बहुलता या वर्चस्ववाद   की ही सोच नहीं हैबल्कि देश के संविधान की मूल अवधारणा समतासमानता और बंधुत्व के मूल्य,  उच्च जाति के वर्चस्य के लिये एक बड़े संकट के रूप में नज़र  रहे हैंजिसे वह “हिन्दू राष्ट्र“ की स्थापना के माध्यम से निपटाना चाहते हैंl 

संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर दबे कुचले वर्गों को मुख्यधारा के समाजों के बराबर लाने की कोशिशें तमाम बड़े बड़े गतिरोधों के बावजूद अब अपना प्रभाव दिखाने लगी हैवह “हिन्दू राष्ट्र” के लिये एक बड़ा गतिरोध तो है ही साथ में तेज़ी से शिक्षा प्राप्त करते हुये पूरी व्यवस्था में दलितों की बढती हिस्सेदारी ने उच्च जाति वर्ग के वर्चस्य को चुनौती देना शुरू कर दिया है l 

आरक्षण के माध्यम से लगभग सवा दो करोड़ दलित सक्षम वर्ग में शामिल होकर अपनी आगे की पीढ़ियों को जिस गंभीरता से शिक्षित कर रहे हैं उसका परिणाम है कि : 

·                    पिछले दो दशकों से मेडिकलइंजनियरिंगटेक्नोलॉजी  अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण की पूरी सीटें ही नहीं भरी बल्कि दलित छात्रों ने मेरिट के आधार पर सामान्य वर्ग की सीटों पर भी कब्ज़ा किया. 

·                    प्रशासनिक सेवाओं के क्षेत्रों में भी शानदार सफलता हासिल करते हुए दलित वर्ग ने उच्च प्रशासनिक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करlनी शुरू कर दी है. 

·                    दलितों का एक वर्ग उद्यमी के रूप में अपने आप को सफलता पूर्वक स्थापित करते हुए औद्योगिक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है.

 यह डॉ आंबेडकर द्वारा संविधान में स्थापित समतासमानता  बंधुत्व के आधार पर बनते नये भारत के वाहक हैं 

देश की ब्राह्मणवादी व्यवस्था की शिक्षास्वास्थ और सरकारी संस्थानों के निजीकरण के माध्यम से दलित वर्ग के विकास को अवरुद्ध करने की साजिश ही “हिन्दू राष्ट्र” की मूल अवधारणा हैजिसकी शुरुवात CAA– NRC के माध्यम से की जा रही है. 

डॉ अम्बेडकर ने ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद के दो बड़े खतरों से हमें आगाह किया था और आज वह दोनों ही विकरालरूप धारण करके हमारे सामने हैं l CAA –NRC को लाने के पीछे छिपी साजिश यह भी है कि ब्राह्मणवाद के पुनर्स्थापना के लिये उच्च जाति वर्ग के दलाल कॉर्पोरेट के हवाले देश के सभी साधनों, प्राकृतिक संसाधनों को करके आरक्षण कि धार को कुंद किया जा सके जिसका सबसे बड़ा नुक्सान दलितों को होगा. 

यदि 2014 के बाद देश भर कि स्थिति पर एक नज़र डालें तो पता चलता हैकि दलित वर्ग एक बड़ी राजनैतिक चेतना और उर्जा के साथ अपने अधिकारों के संघर्षों को आगे बढ़ाते हुये सरकार के हर जन विरोधी कदम के विरोध में सड़क पर उतर कर चुनौती देता रहा है. 

अम्बेडकर पेरियार सर्किल (चेन्नई), पूना फिल्म इंस्टिट्यूटहैदराबाद यूनिवर्सिटीजेएनयू भीमlकोरे गांव और यूपी के सहारनपुर से दलित युवाओं के आक्रामक प्रतिवाद ने ब्राह्मणवाद की जड़ों को हिला दिया हैऔर वह अपने वर्चस्य को राष्ट्रीय स्तर में दलित नेतृत्व में ढलता हुआ देख रहा हैजिसके चलते वह CAANRC जैसे भेदभावपूर्ण कानूनों की मदद से ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना के लिये “हिन्दू राष्ट्र “ की परिकल्पना को पूरी करने के लिये अमादा है. 

महत्वपूर्ण यह भी है कि ब्राह्मणवाद सीधे सीधे दलित वर्ग से टकराने के डरता है.  वह समझ चूका हैकि देश के दबे कुचले वर्ग दलित युवा नेतृत्व में एक राष्ट्रीय आन्दोलन की लिये तैयार हो चूका हैब्राह्मणवाद इस एकता को तोड़ने के लिये CAA–  NRC को माध्यम बनाना चाहता हैजिसका पहला निशाना मुस्लिम समुदाय को बनाया जा रहा हैजबकि असली उद्देश्य दलित वर्ग के विकास को अवरुद्ध करके मनु  स्मृति को पुनर्स्थापित करके ब्राह्मणवाद को मजबुत करना है.      

साथियों ! देश की सरकार की ब्राह्मणवादी मानसिकता ने निजीकरण के माध्यम से सरकारी उपक्रम  भारत पेट्रोलियम जैसे अनेक मुनाफे वाले संस्थानों को उच्च जाति के कॉर्पोरेट के हवाले करके आरक्षण की प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयास शुरू कर दिया है. हाल ही में आई NCRB की रिपोर्ट के अनुसार किसानों से ज्यादा बेरोजगार आत्महत्या कर रहे हैं, रियल स्टेट से लेकर मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के हालत बहुत खराब हैं. वाहनों की बिक्री में भारी गिरावट सरकार दर्ज हो रही है. देश एक  गंभीर आर्थिक संकट से गुज़र रहा है. 

हमारी रणनीति : 

·        इस गंभीर स्थिति के प्रतिवाद-प्रतिरोध के लिये हमें डॉ आंबेडकर के मार्ग दर्शन और मान्यवर कांशीराम जी की रणनीति को एक बार पुन: दिशा लेते हुये निम्न प्रयास करने होंगे: 

·        CAANRC के विरोध में एक स्वतन्त्र दलित आन्दोलन खड़ा करने के लिये दलित समुदाय के बीच व्यापक जागरूकता अभियान चलाना होगा. जिसके लिये प्रतिदिन अपने महत्वपूर्ण समय में से तीन – चार घंटे निकाल कर समाज के बीच जाना होगा.

·        प्रतिदिन किसी एक दलित समुदाय की बस्ती में स्थानीय स्तर पर बैठक करके इस पर्चे के पढ़ें और CAANRC के मुद्दे पर समुदाय को जागरूक करते हुये प्रतिरोध में शामिल होने की अपील करें l 

·        स्थानीय स्तर में छोटी छोटी टोलियों में  CAANRC के विरोध में चल रहे लोकतान्त्रिक आन्दोलनों में शामिल होने का प्रचार अभियान चलायें.  

·        CAANRC के मुद्दे पर अपने परिवार विशेषरूप से परिवार की महिलाओं और बेटियों को जागरूक करते हुये उन्हें आन्दोलन में नेतृत्व लेने के लिये तैयार करना होगा. 

·        लोकतान्त्रिक और सकारात्मक तरीके से सोशल मीडिया का व्यापक इस्तेमाल करते हुये CAANRC के पीछे छुपी ब्राह्मणवादी साजिश को बेनकाब करना होगा. 

·        CAANRC के विरोध में अपने आस-पास संवैधानिक अधिकारों और लोकतान्त्रिक मूल्यों के आधार पर चल रहे प्रत्येक आन्दोलन में परिवार सहित विशेष रूप से महिलाओं और बेटियों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी. 

विशेष आग्रह : यदि आप इन बिन्दुओं के प्रति सहमती रखते हैं तो दलित समुदाय के बीच एक बड़े अभियान को चलने के लिये इस्तेमाल कर सकते हैं. 

जय भीम ! 

निवेदक : राष्ट्रीय भूमि, श्रम एवं न्याय आन्दोलन

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