मेरी कविताएँ === उजाले की ओर —– आखिर कब तक

नरेन्द्र वाल्मीकि

(समाज वीकली)

उजाले की ओर

हमारे पूर्वज
हमारा अभिमान हैं,
हमारे पूर्वज इस
देश की मूल संतान हैं,
हमारे पूर्वज कभी
शासक हुआ करते थे
इस देश के।
हमारे पूर्वजों को
गुलाम बनाकर
कराये गये घृणित कार्य
अब समय आ गया है
इन कार्यों को छोड़ने का
अपने पूर्वजों के गौरव को
आगे बढ़ाने का
बाबा साहब के दिखाए रास्तों
को अपनाते हुए,
बढ़ाने होंगे अपने कदम
उजाले की ओर।

आखिर कब तक

आखिर कब तक
करते रहोगे अमानवीय काम
ढोते रहोगे मलमूत्र
मरते रहोगे सीवरों में
निकालते रहोगे गंदी नालियाँ
ढोते रहोगे लाशें
आखिर कब तक
सहोगे ये जुल्म
कब तक रहोगे
खामोश ?
सुनो सफाईकर्मियों !
अब बजा दो
बिगुल
इन गंदे कामों के 
खिलाफ,
हिला दो चूल
उन ‘दिव्य सुख’
बताने वालों की,
तोड़ दो
सारे बंधन
जो-
बाधक बनते है,
तुम्हारी तरक्की के
रास्तों में।

– नरेन्द्र वाल्मीकि

सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)
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