भीमा कोरेगांव मामला – केंद्र सरकार के दमन और लोकतान्त्रिक मूल्यों के व्यापक हनन का एक उदहारण 

(समाज वीकली)

Father Stan Swamy

8 अक्टूबर 2020 को नैशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (NIA) ने रांची से 83-वर्षीय फादर स्टैन स्वामी को भीमा-कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किया (स्टैन स्वामी के जीवन और उनकी गिरफ़्तारी पर संक्षिप्त नोट संलग्न है). गिरफ़्तारी से दो दिन पूर्व स्टैन स्वामी ने अपने वक्तव्य में सभी आरोपों और उनके विरुद्ध NIA द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ का स्पष्ट खंडन किया.

एक महीने पहले, 7-8 सितम्बर को, सांस्कृतिक कार्यकर्ता सागर गोरखे, रमेश गाईचोर और ज्योति जगताप (कबीर कला मंच के सदस्य) को भी इस मामले में गिरफ्तार किया गया था. 2018 से अभी तक 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, कई लोगों के घरों पर छापे मारे गए हैं और अनेकों को परेशान किया गया है. ये ऐसे मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील, सांस्कृतिक कार्यकर्ता या बुद्धिजीवी हैं जो दशकों से आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यकों और वंचितों के अधिकारों के लिए संघर्षत रहे हैं.
भीमा-कोरेगांव मामले को बहाना बनाकर पहले महाराष्ट्र पुलिस ने और अब NIA एक राष्ट्रव्यापी माओवादी पहल की कहानी रच रही है और देश के विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं को इससे जोड़ रहे हैं. जब कि भीमा-कोरेगांव हिंसा के लिए ज़िम्मेवार लोगों – हिंदुत्व संगठनों के नेताओं – के विरुद्ध कार्यवाई नहीं की गयी.

इस मामले में हाल में हुई गिरफ्तारियों और देश में मतभेद के अधिकार और लोकतान्त्रिक मूल्यों पर लगातार हमले के विरुद्ध PUCL 21 अक्टूबर को एक प्रेस वार्ता का आयोजन कर रहा है. प्रेस वार्ता को कई विशिष्ट सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकील व राजनैतिक नेताओं द्वारा संबोधित किया जाएगा.

क्या है भीमा-कोरेगांव षड्यंत्र मामला

1 जनवरी 2018 को भीमा-कोरेगांव में हिंसा फ़ैलाने के फ़र्ज़ी आरोपों पर आज देश के 16 जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवि जेल में बंद है. इस मामले को बहाना बनाकर जन-विरोधी नीतियों पर सवाल करने वाले देश के विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों पर छापे मारे, परेशान किया जा रहा है और पूछताछ से परेशान किया जा रहा है.

1818 में पेशवा सेना के विरुद्ध दलित सैनिकों की जीत मनाने के लिए महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हर साल 1 जनवरी को दलित-बहुजन इकत्रित होते हैं. 1 जनवरी 2018 को इस घटना की 200 वर्ष होने के उत्सव में हज़ारों दलित-बहुजन इकत्रित हुए थे. 31 दिसंबर 2017 को भीमा-कोरेगांव से 30 किमी दूर पुणे शहर में एलगार परिषद का आयोजन हुआ था जिसमें देश में बढ़ती साम्प्रदायिकता, हिंदुत्व ताकतों और सरकार की जन-विरोधी नीतियों की कड़ी निंदा हुई थी और लोगों ने संविधान की रक्षा करने की शपथ ली थी. एलगार परिषद में 200 से अधिक दलित, बहुजन, अन्य अम्बेडकरवादी और विभिन्न जन संगठनों ने भाग लिया था और हजारों की संख्या में लोग आए थे. इस परिषद का समन्वयन सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर्ड न्यायाधीश पी. बी. सावंत और कोलसे पाटिल ने किया था.
1 जनवरी 2018 को हिंदुत्व संगठनों ने भीमा-कोरेगांव में आए दलितों के विरुद्ध हिंसा की. इसके विरुद्ध महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदर्शन हुए और 3 जनवरी को प्रकाश आंबेडकर व अन्य दलित नेताओं द्वारा राज्यव्यापी बंद का ऐलान किया गया. बंद में बड़ी संख्या में दलित, मराठा और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने भाग लिया.

जैसा आजकल लगातार हो रहा है, यहाँ भी दलित पीड़ितों के विरुद्ध ही 600 से अधिक प्राथमिकी दर्ज कर दी गयी. कई स्वतंत्र तथ्यान्वेषणों में पाया गया है कि भीमा-कोरेगांव में हिंसा की पहले से तैयारी थी और संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोते के नेतृत्व में हिंदुत्व संगठनों ने हिंसा की थी. इसके बावज़ूद इन लोगों के विरुद्ध पर्याप्त कार्यवाई नहीं की गयी. वहीँ दूसरी ओर, इस मामले में हिंदुत्व संगठन के करीबी तुषार दामगुड़े द्वारा की गई प्राथमिकी को महाराष्ट्र पुलिस ने एक षड्यंत्र का रूप दिया और यह कहानी रची कि एलगार परिषद और उस दौरान हुई हिंसा माओवादियों ने कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर आयोजित की थी. इस प्राथमिकी में विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप (निवारण) अधिनियम (UAPA) और देशद्रोह की धाराओं को जोड़कर देश के कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों व बुद्धिजीवियों को आरोपी और संदिग्ध बना दिया. अभी तक इस मामले में अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं से पूछताछ की गयी है और कई लोगों के घर पर छापा मारा गया है.

अभी तक स्टैन स्वामी समेत 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया है जिसमें निम्न मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील, सांस्कृतिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी शामिल हैं: आनंद तेलतुम्ब्ड़े, अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा, हनी बाबु, महेश राउत, सुरेन्द्र गाडलिंग, सुधा भरद्वाज, शोमा सेन, सुधीर धावले, रोना विल्सन, वर्नन गोंज़ल्वेस, वरावरा राव और कबीर कला मंच से जुड़े रमेश गैचोर, सागर गोरखे और ज्योति जगताप. ये सभी ऐसे व्यक्ति हैं जो दशकों से आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यकों और वंचितों के अधिकारों के लिए संघर्षत रहे हैं (इनके संक्षिप्त विवरण संलग्न है). मज़ेदार बात है कि एल्गार परिषद व भीमा-कोरेगांव के समारोह में इनमें से अधिकांश व्यक्ति उपस्थित भी नहीं थे.
इसी बीच भाजपा के करीबी मीडिया चैनल ‘रिपब्लिक’ एवं ‘ज़ी न्यूज़’ ने कुछ पत्रों का खुलासा किया जिनमें आरोपियों और माओवादियों के बीच सम्बन्ध का ज़िक्र था. यही नहीं, उन्होंने यह भी दावा किया कि “राजीव गाँधी की हत्या की तरह ही” “मोदी राज” ख़त्म करने की साजिश पर भी पत्र मिला है. पुणे पुलिस ने कुछ ऐसे पत्रों को मीडिया में भी जारी किया. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश चन्द्रचूर ने इस मामले से जुड़े एक केस में अपनी मतभेद निर्णय में पुलिस को ऐसा मीडिया ट्रायल करने व नियम अनुसार अनुसन्धान न करने के लिए डांटा और यह भी कहा कि इन पत्रों की सत्यता पर ही सवाल है.

महाराष्ट्र में नवम्बर 2019 में बनी गैर-भाजपा सरकार ने जैसे ही इन फ़र्ज़ी मामलों को वापिस लेने की चर्चा शुरू की, वैसे ही केंद्र सरकार ने इन मामलों को NIA के हवाले कर दिया. NIA ने भी कई गिरफ़्तारियां की और कई लोगों से घंटों पूछ-ताछ की. इस मामले में ऐसी चार्जशीट बनाई गयी कि कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता, जो जनता के पक्ष में आवाज़ उठाता है, उसे फंसाया जा सकता है.

चार्जशीट व सबूत

गिरफ्तार किए गए पहले पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध पुणे पुलिस ने पहला चार्जशीट नवम्बर 2018 में दायर किया. 21 फ़रवरी 2019 में पुणे पुलिस ने और चार सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध सप्लीमेंत्री चार्जशीट दायर की. चार्जशीट लगभर 8000 पेज का है लेकिन संदिग्ध लोगों के विरुद्ध स्पष्ट आरोप नहीं है और न ही उनका भीमा-कोरेगांव मामले के हिंसा से सम्बन्ध स्पष्ट होता है. NIA ने हाल में ही फिर से 10000 पन्नों का नया चार्जशीट दायर किया है जिसे अभी पढ़ा जा रहा है. ऐसी भारी और लम्बी चार्जशीट के बावज़ूद, मामले में आरोपिओं के विरुद्ध प्रस्तुत अधिकांश सबूत टाइप / प्रिंट की हुई चिट्ठियां हैं जो प्रेस में 31 अगस्त 2018 को “लीक” किए गए थे. पुलिस ने यह कहानी रची कि एलगार परिषद और उस दौरान हुई हिंसा माओवादियों ने कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर आयोजित की थी एवं यह देश के विरुद्ध माओवादियों के राष्ट्रिय षड्यंत्र का हिस्सा है. चार्जशीट मुख्यतः बिना हस्ताक्षर के एवं असत्यापित व असंपुष्ट चिट्ठियों (जो तथाकथित रूप से आरोपियों के हार्डड्राइव से मिले हैं) पर आधारित है. मज़ेदार बात है कि ये चिट्ठियां आरोपियों के उन कंप्यूटर में बनायीं भी नहीं गयी हैं, जिनसे इन्हें निकालने का दावा किया गया है. यह तो स्पष्ट है कि किसी भी न्यायायिक ट्रायल में इन चिट्ठियों को सबूत के रूप में पेश नहीं किया जा सकता है. लेकिन वे UAPA के तहत आरोपित लोगों को बेल न देने के लिए पर्याप्त हैं!

गिरफ़्तारी के पहले, कबीर कला मंच के रमेश गाईचोर और सागर गोरखे ने एक विडियो वक्तव्य जारी कर कहा था कि NIA गिरफ़्तारी का डर दिखा कर उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने गलत वक्तव्य और सबूत देने के लिए दबाव दे रहा है. लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए और गिरफ्तार होना स्वीकार किए. उन्होंने इस बात को दोहराया जब उन्हें NIA कोर्ट में प्रस्तुत किया गया. इसके पहले हनी बाबु ने भी अपने परिवार वालों को यह बात कही थी कि गिरफ्तारी का डर दिखाकर उन्हें गलत वक्तव्य देने के लिए दबाव दिया जा रहा है. अब यह देखना है कि न्यायालय इन बातों पर सही से विचार करती है कि नहीं.

PUCL के मांग:
 स्टेन स्वामी को तुरंत रिहा किया जाए और उन्हें उनकी स्वास्थ्य और उम्र की आवश्यकताओं अनुसार रहने के स्थान को तय करने का अधिकार दिया जाए.
 भीमा कोरेगांव केस में गिरफ्तार किए गए सभी 16 लोगों को तुरंत रिहा किया जाए और इस केस को बंद किया जाए.
 UAPA को रद्द किया जाए

यह मीटिंग सभी मानवाधिकार संगठनों, नागरिक संगठनों और राजनैतिक दलों को आव्हान देती है कि UAPA और NIA को रद्द करने के लिए मिलकर एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया जाए.

अनुलग्नक 1 – भीमा-कोरेगांव मामले में गिरफ्तार हुए लोगों का विवरण

सुधा भरद्वाज: छत्तीसगढ़ में कार्यरत ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता व वकील. छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मजदूर कार्यकर्ता समिति) के साथ जुड़ी हुई. PUCL की राष्ट्रीय सचिव और अखिल भारतीय जन वकील संगठन (IAPL) की उपाध्यक्ष. गिरफ़्तारी – 28 अगस्त 2018.

वरावर राव: हैदराबाद में रहने वाले कवि और रिटायर्ड कॉलेज शिक्षक. स्रुजुना नामक साहित्यिक पत्रिका के पूर्व संपादक एवं विरासम (क्रन्तिकारी लेखक संघ) के एक संस्थापक. माओवाद विचारक. कई बार गिरफ्तार किए गए लेकिन हमेशा बरी हुए हैं. गिरफ़्तारी – 28 अगस्त 2018.

आनंद तेलतुम्ब्ड़े: जाने-माने दलित लेखक और शोधकर्ता. इंजिनियर एवं इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (अहमदाबाद) से स्नातक. IIT (खरगपुर) के पूर्व शिक्षक और वर्तमान में गोवा इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट में वरिष्ट प्रोफेसर. गिरफ़्तारी – 14 अप्रैल 2018.

गौतम नवलखा: दिल्ली में रहने वाले पत्रकार, लेखक व सिविल राइट्स एक्टिविस्ट. इकॉनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली (EPW) के पूर्व संपादक. हिंदी साहित्यिक पत्रिका हंस के प्रबंध संपादक. गिरफ़्तारी – 14 अप्रैल 2018.

सुरेन्द्र गड्लिंग: नागपुर में रहने वाले प्रसिद्ध दलित एक्टिविस्ट और वकील. अखिल भारतीय जन वकील संगठन (IAPL) के महासचिव. जी एन साईबाबा, सुधीर धावले, अरुण फरेरा और वर्नोन गोंसाल्वेस के पक्ष में केस लड़े हैं. गिरफ़्तारी – 6 जून 2018

सुधीर धावले: मुंबई में रहने वाले लेखक और जाती-विरोधी एक्टिविस्ट. विद्रोही पत्रिका के संपादक. रिपब्लिकन पैंथरस पार्टी के सदस्य. 2011 में गिरफ्तार हुए थे और चार साल बाद बरी हो गए थे. गिरफ़्तारी – 6 जून 2018

महेश राउत: गडचिरोली में रहने वाले आदिवासी अधिकारों पर संघर्षत एक्टिविस्ट. भारत जन आन्दोलन से जुड़े हुए. TISS, मुंबई से पढ़ाई की और गडचिरोली में प्रधान मंत्री ग्रामीण विकास फेलो (PMRDF) के रूप में काम किया. विस्थापन के विरुद्ध संघर्षत मंच, विस्थापन विरोधी जन विकास आन्दोलन के सह-संयोजक. गिरफ़्तारी – 6 जून 2018

रोना विल्सन: दिल्ली में रहते हैं. राजनैतिक कैदियों के मुद्दे पर संघर्षत. Committee to Release Political Prisoners के जन संपर्क सचिव. जी एन साईंबाबा की रिहाई के लिए काम किया और UAPA व NSA जैसे दमनकारी कानूनों के विरुद्ध संघर्षत. गिरफ़्तारी – 6 जून 2018

शोमा सेन: नागपुर में रहने वाली एक प्रसिद्ध शैक्षिक एवं दलित और महिला अधिकारों पर संघर्षत एक्टिविस्ट. नागपुर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग की अध्यक्ष थी. वे Committee for the Protection of Democratic Rights में सक्रीय रूप से जुड़ी थी. गिरफ़्तारी – 6 जून 2018

अरुण फरेरा: ठाणे में रहने वाले लेखक, कार्टूनिस्ट और वकील. वे 2007 में गिरफ्तार हुए थे और तब से बरी होते ही तुरंत फिर से गिरफ्तार किए गए. लगभग पांच साल जेल में थे और फिर सभी मामलों में बरी हुए. उन्होंने जेल के अनुभव पर एक जेल डायरी लिखा जो “कलर्स ऑफ़ द केज” के नाम से छपी है. गिरफ़्तारी – 28 अगस्त 2018

वर्नोन गोंसाल्वेस: चंद्रपुर, महाराष्ट्र में रहने वाले एक लेखक, अनुवादक और असंगठित मज़दूरों के पूर्व ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता. मुंबई विश्वविद्यालय से कॉमर्स में गोल्ड मैडल प्राप्त छात्र. कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ ट्रेड यूनियन से जुड़ गए. 2013 में 18 मामलों में बरी होने से पहले लगभग 6 साल जेल में गुज़ारा. एक मामले में दोषी पाए गए थे जिसके विरुद्ध अभी बॉम्बे उच्च न्यायालय में अपील की गयी है एवं एक अन्य मामले में गुजरात उच्च न्यायालय में डिस्चार्ज आवेदन लंबित है. गिरफ़्तारी – 28 अगस्त 2018

हनी बाबु: दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर. वे भाषाविद हैं एवं जाती और भाषाओँ पर शोधकर्ता हैं. वे आरक्षण के पक्ष और विश्वविद्यालय में अन्य सामाजिक न्याय आन्दोलनों से सक्रीय रूप से जुड़े रहे हैं. गिरफ़्तारी – 28 जुलाई 2020 रमेश गाईचोर, सागर गोरखे और ज्योति जगताप: ये सभी कबीर कला मंच से जुड़े कवि व गायक हैं. कबीर कला मंच पुणे का एक दलित और मार्क्सवादी विचारधारा आधारित संगठन है. 2013 में भी रमेश और सागर गिरफ्तार हुए थे और तीन सालों तक जेल में थे. फिर सर्वोच्च न्यायालय से उन्हें बेल मिली थी. गिरफ़्तारी – रमेश गाईचोर और सागर गोरखे 8 सितम्बर 2020 को गिरफ्तार हुए और ज्योति जगताप 9 सितम्बर 2020 को.

स्टैन स्वामी: स्टैन झारखंड के एक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वे चार दशकों से राज्य के आदिवासी व अन्य वंचित समूहों के अधिकारों के लिए संघर्षत रहे हैं. उन्होंने विशेष रूप से विस्थापन, संसाधनों की कंपनियों द्वारा लूट, विचाराधीन कैदियों व पेसा कानून पर काम किया है. स्टैन ने समय समय पर भाजपा सरकार की भूमि अधिग्रहण कानूनों में संशोधन करने के प्रयासों की आलोचना की है. साथ ही, वे वन अधिकार अधिनियम, पेसा, व सम्बंधित कानूनों के समर्थक हैं. गिरफ्तार – 8 अक्टूबर 2020

(यह नोट 21 अक्टूबर को भीमा-कोरेगांव मामले में स्टेन स्वामी समेत सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की गिरफ़्तारी के विरुद्ध एवं उनके
रिहाई की मांग के लिए PUCL द्वारा आयोजित ऑनलाइन राष्ट्रिय प्रेस वार्ता (ऑनलाइन) जिसे कई सामाजिक कार्यकर्ता, वकील व राजनैतिक नेताओं ने
संबधित किया, में रिलीज़ किया गया.)